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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । ततो जगति जातेषु भगवन्युष्मदादिषु । भरद्वाजपुलस्त्यात्रिनारदेन्द्रमरीचिषु ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

भुशुण्ड ने कहा : भगवन्‌, (जब मुझे अनेक युगो की आश्चर्यजनक घटनाओं का वैसा अभ्रान्त स्मरण है, तब उनके बाद (कुछ पहले या आज के सर्ग में) उत्पन्न हुए आपको लेकर भरद्वाज, पुलस्त्य, अत्रि, नारद, इन्द्र ओर मरिचि इनके विषय में स्मरण की तो गणना ही क्या ? यानी उनके विस्मरण की तो सम्भावना कभी हो ही नहीं सकती, यह भाव हे (४) )

सर्ग सन्दर्भ

इक्क सर्वाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग॑ पुनः देखे गये वसिष्ठ के अष्टम जन्म आदि का, सम ओर अर्धसम सृष्टि का तथा क्षीर-सागर के मंथन आदि का वर्णन ।