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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

तदीयेनैव जातोऽयं संनिवेशेन पादपः । ताते जीवति यैवाभूच्छोभास्य सुतरोस्तथा ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, मेरे पिता चण्ड के जीवनकाल में इस कल्पतरूप की जो शोभा थी, ठीक वही शोभा इस समय भी है तथा जो उस समय इसके प्राक्तन सन्निवेश (अवयव-विन्यास) थे उनके तुल्य दूसरे नवीन अवयव-विन्यास इसके विहित हैं, मैंने यहाँ इस समय स्थिति प्राप्त की है