Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
कदाचिद्धिमवद्वासी कदाचिन्मलयाचलः ।
कदाचित्प्राक्तनेनैव संनिवेशेन भूधरम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
निवासस्थान के भेद को ही विशवरूप से बतलाते हैं।
महाराज, किसी समय मैं एकान्त में विन्ध्य-प्रदेश में अपना स्थान बनाता हूँ, किसी समय सहाद्रि
में अपना स्थान बनाता हूँ, तो किसी समय दर्दुर-पर्वत पर निवास करता हूँ॥ ३ ९॥ किसी समय हिमालय-
पर्वत पर वास करता हूँ, किसी समय मलय-पर्वत पर स्थिर होता हूँ, तो किसी समय प्राक्तन अवयव-
सन्निवेश से ही इस पर्वत पर आकर इस कल्पवृक्ष की शाखा में घोंसला बनाता हूँ