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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

समेकसंनिवेशानि बहूनि विषमाणि च । तथार्धसमरूपाणि त्रिजगन्ति स्मराम्यहम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रत्येक सर्ग में भूलोक आदि की अवयवों से समानता का जो नियम है, वह भी औत्सर्गिक है, यों कहते हैं। महाराज, ये तीनों जगत किसी कल्प में समान अवयव-सन्निवेश (आकार) वाले थे, किसी कल्प में अत्यन्त विषम थे तथा किसी समय आधे समानरूप थे - इसका मुझे स्मरण है