Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
त्रेतायां द्वापरे चैव संस्मरामि मुनीश्वर ।
अदृष्टवेदवेदार्थान्स्वसंकेतविहारिणः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
संक्षेपत: कलियुग-स्थिति का वर्णन करते हैं।
मुनिराज, किसी कल्प में सत्ययुग में भी कुछ ऐसे मनुष्यों का मुझे स्मरण है कि जिन्होंने जो वेद
ओर वेदार्थो का दर्शन तक नहीं किये थे । अपने संकेतमात्र से ही व्यवहार करते थे, उनका आचरण
अत्यंत उच्छुंखल था। (सत्ययुग में भी पुष्कर ने महाराज नल के ऊपर द्यूत से विजय पाई थी और बिना
अपराध पत्नी के साथ एक वस्त्र से उन्हें निर्वासित किया था, यह प्रसिद्ध बात हे ।)