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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

चतुर्युगसहस्रान्ते जगच्छून्यं स्मराम्यहम् । मनोमनननिर्माणान्पार्थिवाकारवर्जितान् । व्याप्तान्वायुमयैर्भूतैर्दश सर्गान्स्मराम्यहम् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार जगत के लीन होने पर भी चन्द्रमा सम्बन्धी मन के मनन से निर्मित हुए पूर्वोक्त दस सर्गो का, जो स्थूल पार्थिवाकार से वर्जित तथा वायुप्राय भूतों से व्याप्त थे, मैं स्मरण करता हूँ