Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
दिगुत्तराभूदन्येयं पूर्वमेव महीधरः ।
एकैकदेहसंस्थानवीतब्रह्मनिशागमः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब उन दिशा आदि की नाई तुम भी प्रत्येक कल्प में दूसरे और समान सन्निवेशवाले क्यो नहीं
हो ? तो इस पर कहते हैं।
मैं एक ही रहा और एक ही अवयव-सन्निवेश से मैंने ब्रह्माजी की निशा का अतिक्रमण किया,
क्योंकि कल्पान्त में पूर्वोक्त धारणाओं से स्थिर की गई निर्विकल्प समाधि के अवसान में पुनः उत्पन्न
हुआ यह सर्ग देख कर मैं “वही यह मेरु पर्वत हे", "वही यह कल्पतरुवृक्ष है" यों प्रत्यभिज्ञायमान पदार्थ
के रूप में ही इस सृष्टि को जानता हूँ। यदि मैं दूसरा होता, तो तत्ततविषयिणी उक्त प्रत्यभिज्ञा (देखी
हुई वस्तु को पहिचानना) नहीं होती, यह भाव है