Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 9
आठवाँ सर्ग समाप्त नवाँ सर्ग यह सुनकर निर्वेद से घर आये हुए राजा का अर्थो के मूल कारण के विचार से मन का निर्णय कथन |
30 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : सिद्धगणों से गाई गई इस गीताओं को सुनकर राजा जनक जैसे उरपोक आदमी रण…
- Verses 2–10प्रपंचरहित इन्द्रजाल द्वारा मुझे मोहित किया ? ओह ! कष्ट है कि मैं अत्यन्त मोहित हो रहा हू…
- Verse 11यदि कोई शंका करे दूर देश में शायद कोई वैसी वस्तु प्रसिद्ध हो । इस पर नहीं ऐसा कहते हैं। द…
- Verse 12लोगों के भोग के लिए धनोपार्जन आदि में प्रवृत्तिरूप जो आवेग है, वह जल की भँवरी की तरह नश्व…
- Verses 13–14प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन, प्रतिक्षण जो दुःख से निबिड सुख हैं वह दुख ही हैं । इस संसा…
- Verse 15आज जो बड़े लोगों के मस्तक पर विराजमान यानी महत्तम हैं, वे कुछ ही दिनों में नीचे गिर जाते…
- Verses 16–20मैं बिना रस्सी के ही बँधा हूँ । बिना पंक के ही कलंक से युक्त हूँ। सबसे ऊपर स्थित होकर भी…
- Verses 21–34पृथु, मरुत्त आदि चक्रवर्ती राजाओं के वे महाविभव, वे सुन्दर गुणवाले, स्नेहयुक्त बान्धव सभी…
- Verses 35–37बाद में भी अज्ञ पुरुष के सुख की आशा नहीं है, यह कहते हैं। इस संसार मेँ अज्ञ मनुष्य प्रत्य…
- Verse 38यदि कोई शका करे कि यन्न दुःखेन संभिन्नम्* इत्यादि श्रुति से (~>) बतलाये गये लक्षण से युक…
- Verse 39न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपह॒तिरस्ति (शरीरधारी प्राणी के प्रिय एवं अप्रिय का वारण…
- Verse 40देह का अभिमान रहने पर आधिव्याधि के दुर्निवार होने के कारण अज्ञ पुरुष को कहीं भी विश्रान्त…
- Verse 41विनाशी एवं दुःखमिश्रित होने के कारण सम्पूर्ण दृश्य की अभद्रता दिखलाते है । वर्तमानकालिक द…
- Verse 42अज्ञान से विमोहित क्षुद्र प्राणी उत्पन्न होते हैं और मरते हैं । पृथ्वी इन्हीं लोगों से नि…
- Verse 43नीलकमल के तुल्य मनोहर ओर भ्रमर के तुल्य चंचल नेत्रवाली, अतिशय प्रीतिरूप भूषण से युक्त (अत…
- Verses 44–46यदि कोई शंका करे कि राजा होने के कारण निग्रह ओर अनुग्रह में समर्थ, उत्तम पुरुषरूप आपको वि…
- Verse 47इसी तरह यदि दरिद्रता, बन्धनाश, राज्यनाश आदि आपत्तिर्यो भी साधु संगति, तीर्थ तपस्या, ज्ञान…
- Verse 48इसलिए असत्यभूत जगत में ममता की अभिवृद्धि ही विपत्ति है, विवेक से ममता का परिक्षय ही सम्पत…
- Verse 49काकतालीय न्याय से अकस्मात अविचार से सम्पन्न इस जगत स्थिति में भोग लम्पट इस मन ने व्यर्थ ह…
- Verse 50जैसे परिच्छिन्न एवं सन्तप्त अग्निशिखाओं में पतंगे अनुरक्त रहते हैं वैसे ही देश, काल और वस…
- Verse 51अम्यासवश निरन्तर दुःख का भोग सह्य भी हो सकता है; परन्तु सुख भोग से अभ्यास के विच्छिन्न हो…
- Verse 52सुख सुख नहीं है; किन्तु दुःख विशेषरूप ही है, इसका युक्ति से उपपादन करते है । संसार ही सब…
- Verse 53स्वाभाविक महादुःख से पूर्ण इस संसार मेँ जो स्थित हैं; वे लोग जैसे तलवार के आघात की अपेक्ष…
- Verse 54यद्यपि मैं श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणो में कुशल, मेघावी, विचार चतुर हूँ, तथापि छोटे-बड़े क…
- Verse 55अव अपनी प्रमाण कुशलता को संसार के मूलनिश्वय से सफल बनाते हैं। सैकड़ों संकल्परूपी अंकुर, द…
- Verse 56मन का भी रहस्य मुझे ज्ञात है, यह कहते है। मैं संकल्प को ही मन समझता हूँ, उस मन का संकल्प…
- Verses 57–58आकारमात्र से रमणीय, नाश को प्राप्त करानेवाली मनरूपी बन्धन की चपलताओं के परिज्ञात हो जाने…
- Verse 59ओह ! मैं मारा गया, नष्ट हुआ, मरा, ऐसा जो मैंने बारम्बार शोक किया था, वह शोक मेरा बीत गया…
- Verses 60–64इसे मारता हूँ। यह केवल चोर ही नहीं है, किन्तु वैरी भी है, क्योंकि इसने मुझे बहुत दिन तक म…
- Verse 65इसलिए मैं कभी भी परमात्मनिष्ठा का त्याग नहीं करूँगा, यह कहते हैं। मैं आत्मरूपी मणि को पाक…