Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
वरमेकान्तदाहेषु लुठनं रौरवाग्निषु ।
नत्वालूनविवर्तासु स्थितं संसारवृत्तिषु ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
अम्यासवश निरन्तर दुःख का भोग सह्य भी हो सकता है; परन्तु सुख भोग से अभ्यास के विच्छिन्न
हो जाने पर दुःख भोग दुःसह हो जाता है, ऐसा कहते है ।
निरन्तर दाह से युक्त रोरव की अग्नि में लोटना अच्छा है, परन्तु विच्छिन्न सुख -दुःख के परिवर्तन
से युक्त संसार की अवस्थाओं मेँ स्थिति करना अच्छा नहीं है