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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

प्रत्यब्दं प्रतिमासं च प्रत्यहं च प्रतिक्षणम् । सुखानि दुःखपिण्डानि दुःखानि तु पुनः पुनः ॥ १३ ॥ परामृष्टं विशिष्टं हि दृष्टं नष्टं न भावितम् । अत्रस्थं न तदस्तीह सतां यत्रास्तु संस्थितिः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन, प्रतिक्षण जो दुःख से निबिड सुख हैं वह दुख ही हैं । इस संसार में कुछ काल तक देखे गये, तदनन्तर तुरन्त नष्ट हुए स्वराज्य आदि पद का अत्यन्त तुच्छ होने के कारण चिन्तन भी मैंने नहीं किया । सर्वोच्च जो ऐन्द्र, प्राजापत्य आदिपद हैं, उनका अच्छी तरह विचार किया, किन्तु जहाँ विवेकी पुरुषों की आत्यन्तिक विश्रान्ति होती है, वैसी कोई वस्तु यहाँ है ही नहीं