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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 21–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verses 21–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 21-34

संस्कृत श्लोक

ते महाविभवा भोगास्ते सन्तः स्निग्धबान्धवाः । सर्वं स्मृतिपथं प्राप्तं वर्तमानेऽपि का धृतिः ॥ २१ ॥ क्व धनानि महीपानां ब्रह्मणः क्व जगन्ति वा । प्राक्तनानि प्रयातानि केयं विश्वस्तता मम ॥ २२ ॥ गिलितानीन्द्रलक्षाणि बुद्बुदानीव वारिणि । मां जीवितनिबद्धास्थं विहसिष्यन्ति साधवः ॥ २३ ॥ ब्रह्मणां कोटयो याता गताः सर्गपरम्पराः । प्रयाताः पांसुवद्भूपाः का धृतिर्मम जीविते ॥ २४ ॥ संसाररात्रिदुःस्वप्ने चेत्ये देहमये भ्रमे । आस्थां चेदनुबध्नामि तत्रेमां तु धिगस्थितिम् ॥ २५ ॥ अयं सोऽहमिति व्यर्थकल्पनाऽसत्स्वरूपिणी । अहंकारपिशाचेन किमज्ञवदहं स्थितः ॥ २६ ॥ हतं हतमिदं कस्मादायुराततयानया । पश्यन्नपि न पश्यामि सूक्ष्मया काललेखया ॥ २७ ॥ पादपीठे कृतेशानाः शार्ङ्गिक्रीडनकन्दुकाः । कालकापालिकाग्रस्ताः किमास्थे मयि वल्गसि ॥ २८ ॥ अजस्रमुपयान्त्येते यान्ति चाद्यापि वासराः । अविनष्टैकसद्वस्तुर्दृष्टो नाद्यापि वासरः ॥ २९ ॥ सारसाः सरसीवैते सर्वस्मिञ्जनचेतसि । भोगा एव स्फुरन्त्यन्तर्न तु स्वपददृष्टयः ॥ ३० ॥ कष्टात्कष्टतरं प्राप्तो दुःखाद्दुःखतरं गतः । अद्यापि न विरक्तोस्मि हा धिङ्मामधमाशयम् ॥ ३१ ॥ येषु येषु दृढा बद्धा भावना भव्यवस्तुषु । तानि तानि विनष्टानि दृष्टानि किमिहोत्तमम् ॥ ३२ ॥ यन्मध्ये यच्च पर्यन्ते यदापाते मनोरमम् । सर्वमेवापवित्रं तद्विनाशामेध्यदूषितम् ॥ ३३ ॥ येषु येषु पदार्थेषु धृतिं बध्नाति मानवः । तेषु तेष्वेव तस्यायं दृष्टो नाशोदयो भृशम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

पृथु, मरुत्त आदि चक्रवर्ती राजाओं के वे महाविभव, वे सुन्दर गुणवाले, स्नेहयुक्त बान्धव सभी इस समय जब स्मृति शेष हो गये हैं यानी वे विद्यमान नहीं है, तब फिर वर्तमान में भी क्या आस्था ? प्राचीन राजाओं के प्राक्तन धन कहाँ गये, पूर्वकल्पीय ब्रह्मा के प्राचीन जगत कहाँ गये, यानी सभी नष्ट हो गये, तो फिर धन आदि में मेरी क्या आस्था हो ? जैसे जल में बुद्बुद्‌ काल से नष्ट हो जाते हैं वैसे ही लाखों इन्द्र काल द्वारा नष्ट कर दिये गये, इसलिए यदि मैं जीवन में आस्था बाँध रक्खूँ, तो विवेकी लोग हँसेंगे। करोड़ों ब्रह्मा नष्ट हो गये, सृष्टि परम्पराएँ बीत गई, धूलि की तरह राजा लोग मिट्टी में मिल गये । भला मेरे जीवन में क्या विश्वास है? संसाररूपी रात्रि के दुःस्वप्नभूत, देहमय, अहंताममताव्यवहार भ्रम में यदि मैं आस्था रखता हूँ, तो मेरी इस अविवेकिता को धिक्कार है। शरीर सन्निहित वस्तु में अपरोक्षता की कल्पना, शरीर विप्रकृष्ट वस्तु में परोक्ष की कल्पना और शरीर में आत्मता की कल्पना यह तीन प्रकार की कल्पना असत्यरूपही है । अहंकाररूपी पिशाच के द्वारा मोहित हुआ मैं क्यों अज्ञ की नाई इतने काल तक विचाररहित होकर स्थित हूँ ? मैं इस क्षण, निमेष, मुहूर्त आदिरूप फैली हुई कालरेखा से प्रतिक्षण नष्ट हो रही अपनी आयु को देख रहा हूँ फिर भी मैं न मालूम क्यो नहीं विचार करता हूँ ? जिन्होंने ब्रह्मा आदि उत्तम अधिकारियों को अपने चरणों पर झुका दिया एवं विष्णु आदि की देह को खेलने की गेंद की भाँति युद्ध आदि के समय आकाश में फेंक दिया, ऐसे कालरूपी रुद्र भी जब महाकाल द्वारा नष्ट कर दिये गये, तो हे जीवित आशा, मेरे अन्दर तुम क्यो नृत्य कर रही हो ? वे दिन निरन्तर अब भी आते हैं और इस अवस्था में भी व्यर्थ ही नष्ट हो जाते हैँ । आज तक कोई भी दिन नहीं देखा, जिसमें नित्य, एक, निर्दोष ओर आन्दैकरस वस्तु प्राप्त हुई हो । जैसे तालाब में हंस स्फुरित होते हैं वैसे ही सम्पूर्ण मनुष्यों के चित्त में ये भोग ही स्फुरित होते हैं; किन्तु प्रत्यगात्मभूत परमपद का साक्षात्कार स्फुरित नहीं होता। मैं कष्ट से भी अत्यन्त कष्ट को प्राप्त हुआ, दुःख से भी अत्यन्त दुःख को प्राप्त हुआ; परन्तु आज भी विरक्त नहीं हुआ। हा ! राग, लोभ आदि से दूषित होने के कारण अधम चित्तवाले मुझे धिक्कार है । जिन-जिन उत्तम विषयों में मैंने दृढ़ प्रीति बाँधी, उन-उन विषयों का भी विनाश जब देखा गया, तब भला इस संसार में उत्तम वस्तु क्या है ? मध्यकाल में जो मनोहर है यानी युवावस्था, परिणाम में जो मनोहर है यानी भरम एवं अविचार से जो मनोहर है यानी विषय, विनाशरूपी अशुद्धि से दूषित वैसे अपवित्र हैं। जिन-जिन पदार्थों में मनुष्य अपनी आस्था बाँधता है, उन-उन पदार्थों में उस मनुष्य के दुःख का प्रादुर्भाव बार-बार देखा गया हे