Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
मनोमात्रविवर्तेऽस्मिञ्जगत्यब्धीन्दुभङ्गुरे ।
ममेदमित्यपूर्वेयं कुतस्त्याऽक्षरमालिका ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए असत्यभूत जगत में ममता की अभिवृद्धि ही विपत्ति है, विवेक से ममता का परिक्षय ही
सम्पत्ति है, इस आशय से जगत में ममता की अयोग्यता दिखलाते हैं।
समुद्र में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा की भाँति क्षणविनाशी, मिथ्याभूत, एकमात्र मन के विवर्त जगत में
“मेरा यह है” यह अपूर्व पदवाक्यरूप अक्षर-पंक्ति किधर से आई ? यानी निरर्थक ही है