Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
दूरस्थमप्यदूरस्थं यन्मे मनसि वर्तते ।
इति निश्चित्य बाह्यार्थभावनां संत्यजाम्यहम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे दूर देश में शायद कोई वैसी वस्तु प्रसिद्ध हो । इस पर नहीं ऐसा कहते हैं।
दूरस्थरूप से प्रसिद्ध भी जो कोई वस्तु है, वह वस्तुतः समीपस्थ ही है, क्योंकि वह मेरे मन में
विद्यमान है। मन देह के बाहर दूर तो जाता नहीं है । यदि वह दूर जाये, तो दूर में ही उसकी प्रतीति का
अनुभव होगा, न कि हृदय में । हृदय में ही सब लोग बाह्य वस्तु के बोध का अनुभव करते हैं, इसलिए
भीतर भासमान दूर आदि की कल्पना भी वास्तविक नहीं है, किन्तु अनर्थ ही है, अतः दूर आदि की
कल्पना त्याज्य ही है, उपादेय नहीं है, ऐसा निश्चय करके मैं बाह्य अर्थ की भावना का त्याग कर रहा
हूँ