Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 57–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 57,58
संस्कृत श्लोक
आकारमात्ररम्यासु मनोमर्कटवृत्तिषु ।
परिज्ञातास्विहाद्यैव न रमे नाशनीष्वहम् ॥ ५७ ॥
आशापाशशतप्रोताः पातोत्पातोपतापदाः ।
संसारवृत्तयो भुक्ता इदानीं विश्रमाम्यहम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
आकारमात्र से रमणीय, नाश को प्राप्त करानेवाली
मनरूपी बन्धन की चपलताओं के परिज्ञात हो जाने पर मैं आज से इनमें रमण नहीं कर सकता । सैकड़ों
आशारूपी पाशो से ओत-प्रोत, अधोगति, ऊर्ध्वगति और दुःख को देनेवाली संसारवृत्तिर्यौ मैंने बहुत
भोगी, अब मैं विश्राम लेता हू