Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 35–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 35-37

संस्कृत श्लोक

श्वःश्वः पापीयसीमेष श्वःश्वः क्रूरतरामपि । श्वःश्वः स्वेदकरीमेति दशामिह जडो जनः ॥ ३५ ॥ अज्ञानैकहतो बाल्ये यौवने मदनाहतः । शेषे कलत्रचिन्तार्तः किं करोति कदा जडः ॥ ३६ ॥ आगमापायि विरसं दशावैषम्यदूषितम् । असारसारं संसारं किं तत्पश्यति दुर्मतिः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

बाद में भी अज्ञ पुरुष के सुख की आशा नहीं है, यह कहते हैं। इस संसार मेँ अज्ञ मनुष्य प्रत्येक दूसरे दिन राग ओर लोभ की अभिवृद्धि से अत्यन्त पापमयी, हिंसा आदि कर्मों में प्रवृत्ति द्वारा अत्यन्त क्रूर तथा फलकाल में खेद देनेवाली दशा को प्राप्त होते हैँ । अज्ञ पुरुष, जो बाल्यावस्था में अज्ञान से पीडित रहता हैं, युवावस्था में काम से पीडित रहता है तथा शेष अवस्था में (वृद्धावस्था में) स्त्री के सहित कुटुम्ब के पालन-पोषण की चिन्ता से पीडित रहता है, कब अपने उद्धार का साधन करता है ? यानी कभी नहीं करता । दुर्मति पुरुष आदि और अन्त मेँ अत्यन्त असत्य, भोगकाल में भी विरस, दरिद्र, रोग, वार्धक्य आदि दशाओं से दूषित तथा असार होते हुए भी सारबुद्धि से गृहीत इस संसार को, जो देख रहा है, वह किसलिए ? यानी संसारदर्शन का कुछ भी प्रयोजन नहीं हे