Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
राजसूयाश्वमेधाद्यैरिष्ट्वा यज्ञशतैरपि ।
महाकल्पान्तमप्यंशं स्वर्गं प्राप्नोति नाधिकम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शका करे कि यन्न दुःखेन संभिन्नम्* इत्यादि श्रुति से (~>) बतलाये गये लक्षण से
युक्त स्वर्ग क्या सारभूत नहीं है ? उस पर कहते है ।
सुकृति पुरुष राजसूय, अश्वमेघ आदि सैकड़ों यज्ञो को करके महाकल्पपर्यन्त भोग्य भी स्वर्ग को
(तिन यन्न दुःखेन संभिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतं च तत्पदं स्वःपदास्पदम् ॥
अर्थात् जो दुःख से मिश्रित हो, न किसी की अपेक्षा न्यून हो और बिना प्रयत्न के इच्छामात्र से
प्राप्त हो, वह सुख स्वर्गपद से कहा जाता है ।
प्राप्त होता है, जो महाकाल की दृष्टि से क्षणमात्र भोग्य अतएव अल्प ही है, किन्तु अधिक की
(अपरिच्छिन्न अनन्त की) प्राप्ति उसे नहीं होती । इसलिए वह भी असार ही है, यह भाव है