Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 47
छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग अतिथि से अपना पूर्वोक्त कीरराज वृत्तान्त सुन कर, स्वयं वहाँ जाकर, देखकर और पुनः पुनः पूछ कर गाधि का विस्मित होना ।
56 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्र, तदनन्तर श्रीगाधिजी जैसे समुद्र का अति संक्षुब्ध…
- Verse 2जैसे प्रलय के समय ब्रह्माजी जगत् की रचना से विरत होते हैँ वैसे ही मन की रचनारूप मोह से व…
- Verse 3जैसे मदिरा आदि के मद के शान्त होने पर स्वच्छ चित्त हुआ पुरुष" मैं अमुक हूँ” इस बोध को प्र…
- Verse 4जो स्नान के लिए जल में उतरा था वह गाधि मैं हूँ यह अवशिष्ट स्नान, तर्पण आदि कृत्य मेरा कार…
- Verse 5जैसे शिशिर ऋतु के अन्त मे वसन्त कमल को, जिसका मुकुलरूपी मुख उत्पन्न हो चुका हो, जल के अन्…
- Verse 6पूर्वानुभूत जल, दिशा और आकाशवाली इस पृथिवी को फिर अन्य-सी देख वे परम विस्मय को प्राप्त हुए
- Verse 7मैं कौन हूँ क्या देखता हूँ, मेने क्या किया यों क्षण भर भ्रूभंगपूर्वक अन्दर विचार करते हुए…
- Verse 8थके हुए मैंने उस थकावट से ही क्षणभर में ही भ्रम देखा। ऐसा विचारकर वह जैसे उदयाचल से सूर्य…
- Verse 9उठकर उन्होंने विचार किया मेरी वह माता कहाँ है ओर वह स्त्री कहाँ है ? जबकि मैं माता और पत्…
- Verse 10जैसे वायु से उड़ाये गये पत्ते का माता-पिता स्थानीय लताप्रधान वृक्ष तलवार से नष्ट हो जाता…
- Verse 11मैं अविवाहित हूँ जैसे ब्राह्मण चित्त में क्षोभ पैदा करनेवाली दुष्ट मदिरा के रस को नहीं जा…
- Verse 12मेरे जन्मभूमि के अमात्य बन्धु-बान्धव मुझसे बहुत दूर है, जिनके बीच में मेने प्राण त्यागे थ…
- Verse 13इसलिए उत्पन्न हुए ये विविध प्रकार के पदार्थ और जन्म आदि का अभिमान गन्धर्वनगर के समान मैंन…
- Verse 14स्वप्न के समान बाध होने के कारण उसकी असत्यता का निश्चय कर उसकी उपेक्षा करते हैं। यह बन्धु…
- Verse 15जैसे मदोन्मत्त सिंह वनराजियों में घूमता है वैसे ही यह प्राणियों का चित्त अनन्त भ्रान्तियो…
- Verse 16इस प्रकार गाधि ने चित्त में उस मोह का विचार कर उसी अपने आश्रम में कुछ दिन बिताये
- Verses 17–18वहाँ एक समय गाधि के पास कोई प्रिय अतिथि ब्रह्मा के पास दुर्वासा की तरह आया । श्रान्त हुए…
- Verse 19एकान्त मे दोनों ने सन्ध्यावन्दन और जप किया। दोनों ही क्रम से कोमल पल्लवो के शयनों पर आकर…
- Verse 20तदनन्तर उन दोनों तपस्वियों की अपने तप, ध्यान आदिकर्मो के अनुरूप शान्तरस प्रधान कथा एसी ही…
- Verse 21गाधि ने बातचीत के सिलसिले में उस अतिथि से पूछा कि ब्रह्मन्, आप क्यों कृश हैं और क्यों थक…
- Verse 22अतिथि ने कहा : भगवान्, मेरी अत्यन्त कृशता और श्रम का कारण सुनिये । हम लोग असत्यवादी नहीं…
- Verse 23इस भूतल में उत्तर दिशारूपी निकुंज है, उसमें कीर नाम से विख्यात समृद्ध ओर विशाल देश है
- Verse 24उसमें पुरवासी लोगों से सन्मानित हो रहा और विविध प्रकार के आत्मा को अच्छे लगनेवाले भोगों म…
- Verse 25वहाँ पर कहीं एक समय एक ने कथा के सिलसिले में मुझसे कहा : हे द्विज, यहाँ पर आठ वर्ष चाण्डा…
- Verse 26तदनन्तर गाँव में पूछे गये सब लोगो नें आठ वर्ष तक यहाँ पर चाण्डाल राजा हुआ, यह कहा
- Verse 27वह अन्त में जाना गया और शीघ्र अग्नि में प्रविष्ट हो गया । उससे सैकड़ों ब्राह्मणों ने यहाँ…
- Verse 28हे विप्र, उनके मुख से यह सुनकर उस देश से बाहर निकलकर मैंने शुद्धि के लिए प्रयाग में प्राय…
- Verses 29–30आज तीसरे चान्द्रायण के बाद पारणा करके मैं यहाँ आया हूँ, इसी कारण मैं थका हूँ और अत्यन्त क…
- Verses 31–32श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जब गाधि ने यह सुना तब उन्होने ब्राह्मण से फिर प…
- Verse 33“जो बात मैंने भ्रान्ति दशा में देखी वही मेरे अतिथि ने सत्य कही । मेरा इस प्रकार का रूप शा…
- Verse 34जो मैंने बन्धुओं के बीचमें अपना वह मरण देखा वह तो निःसन्देह माया ही है उसमें संवाद अर्थात…
- Verse 35में अपने उस चाण्डाल वृत्तान्त को देखने के लिए खेदरहित होकर भूतमण्डल देश की सीमा में स्थित…
- Verse 36ऐसा विचार कर रहे गाधि मण्डलान्तर को जाने के लिए उद्यत होकर जैसे सूर्य मेरु के पार्वभाग को…
- Verse 37उद्योगी बुद्धिमान् पुरुष, मनोराज्य को भी पा जाता हैँ । गाधि ने जाकर स्वप्न में देखा हुआ…
- Verse 38उद्योग से दुष्प्राप्त भी सब कुछ प्राप्त होता है देखिये, न जगन्माया को स्वप्न में देख रहे…
- Verse 39गाधि घर से निकल कर मार्ग में वर्षा ऋतु के जल प्रवाह के वेग से त्वरायुक्त हुए। उन्होने वात…
- Verses 40–41जैसे कटं को चाहनेवाला अकेला ऊँट बबूल के वन में जाता है वैसे ही गाधि एकाकी ही पूर्वोक्त प्…
- Verse 42फिर वहाँ पर बुद्धि में स्थित (स्मृति पथ में आरूढ हो रहे) अवयव संनिवेश से (आकार प्रकार से)…
- Verse 43गन्धर्व के समान गाधि ने जिसमें जन्म आदि के विस्तार का चित्त में विचार किया था ओर जो गृह आ…
- Verse 44पहले देखे गये चाण्डाल गृह ने अपने उसी आकार-प्रकार से गाधि के मन को अपूर्वं वैराग्य में पह…
- Verses 45–46वह चाण्डालगृह वर्षर्तु की मूसलाधार वृष्टि से छिन्न-भिन्न हो गया था, उसकी दीवारों पर जौ के…
- Verses 47–50गाधि ने दाँतों से चबाई हुई गाय, घोड़े, भैंस आदि की सफेद हड्डियों से, जो मानों गवाही देने…
- Verse 51गाधि को बड़ा आश्चर्य हुआ वह जैसे पथिक म्लेच्छनगर को लाँघकर आर्यो के देश में जाता है वैसे…
- Verses 52–53वहाँ पर उन्होंने लोगों से पूछा : हे सज्जन, क्या आपको इस गाँव के छोर पर पहले हुए चाण्डाल व…
- Verses 54–55हे सज्जन, यहाँ पर एकान्त में निवास करनेवाले अतिवृद्ध चाण्डाल का, जो दुःखों की मूर्ति के स…
- Verse 56गाधि नाम के ब्राह्मण ने ग्रामीण लोगों से अत्यन्त आश्चर्य ओर प्रश्नोद्योग के साथ बार-बार प…
- Verse 57ग्रामीणों ने कहा : हे ब्रह्मन्, जैसे आप कहते हैं वह ठीक वैसे ही है, उसमें कुछ भी हेर-फेर…
- Verse 58जिसका वृक्ष के पत्र समूह की नाई पुत्र, पौत्र, सुहृद, चाकर और बन्धु-बान्धवों का संघ अति वि…
- Verse 59जैसे वनाग्नि पर्वत के पुष्पफल से पूर्ण वन को नष्ट कर देती है वैसे ही काल ने जिस वृद्ध के…
- Verse 60तदनन्तर जो देश का त्याग कर कीरप्रदेश में गया, वहाँ पर बिना किसी उद्वेग के आठ वर्ष तक राजा…
- Verse 61वहाँ यथार्थ वृत्तान्त जानकर लोगों ने जिसे ऐसे ही दूर कर दिया जैसे कि लोग अनर्थ की राशि को…
- Verse 62तदुपरान्त लोगों के अग्नि में प्रवेश करने पर आर्यो के संसर्ग से आर्यता को प्राप्त हुआ वह स…
- Verse 63हे प्रभो, आप इतने प्रयास से चाण्डाल को क्यों पूछते हे, क्या वह आपका बन्धु था या आप स्वयं…
- Verse 64इस प्रकार कह रहे ग्रामीणों से फिर-फिर पूछ रहे गाधि वहाँ पर सब प्रान्तो में पूरा एक महीना…
- Verse 65जिस प्रकार गाधि ने चाण्डालता का अनुभव किया था उसी प्रकार सभी ग्रामीणों ने ज्यों-का-त्यों…
- Verse 66सब प्राणियों के मुंह से सत्य वचन सुनकर स्वयं भी अबाधित प्रत्यभिज्ञा से जैसे अनुभूत हुआ था…