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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

अथ विस्मयवान्गाधिस्तां नीत्वा तत्र शर्वरीम् । जगद्गेहमहादीपे रवावुदयमागते ॥ ३१ ॥ कृतप्रातःस्नानविधावापृच्छय स्वातिथौ गते । इदं संचिन्तयामास विस्मयोद्धुरया धिया ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जब गाधि ने यह सुना तब उन्होने ब्राह्मण से फिर पूछा । उन्होने यही बात कही इससे विपरीत बात नहीं कही ॥ ३ ०॥ इसके बाद आश्चर्य को प्राप्त हुए गाधि ने उस रात्रि को वहाँ पर बिताकर जगद्रूपी घर के महादीपस्वरूप सूर्य के उदित होने पर ओर प्रातःकाल स्नानविधि कर चुकने पर पूछकर अपने अतिथि के चले जाने पर विस्मय से भरी हुई बुद्धि से यह विचार किया