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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 52–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, verses 52–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 52,53

संस्कृत श्लोक

तत्रापृच्छज्जनं साधो कच्चित्स्मरति भो भवान् । प्राग्वृत्तमस्य ग्रामस्य पर्यन्ते श्वपचक्रमम् ॥ ५२ ॥ सर्व एव हि धीमन्तश्चिरवृत्तमपि स्फुटम् । करस्थमिव पश्यन्ति मयेति सुजनाच्छ्रुतम् ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर उन्होंने लोगों से पूछा : हे सज्जन, क्या आपको इस गाँव के छोर पर पहले हुए चाण्डाल वृत्तान्त का स्मरण है। सभी धीमान्‌ पुरुष चिरकाल की घटनाओं को भी हथेली में रक्खे हुए आँवले के समान स्पष्टरूप से देखते है, ऐसा मैंने सज्जनों के मुँह से सुना है