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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 17, 18

संस्कृत श्लोक

एकदा गाधिमगमत्कश्चित्तत्र प्रियोऽतिथिः । ब्रह्माणमिव दुर्वासाः स विशश्राम सश्रमः ॥ १७ ॥ परमां तुष्टिमानीतः फलपुष्परसाशनैः । सोऽतिथिर्गाधिना तेन वसन्तेनेव पादपः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ एक समय गाधि के पास कोई प्रिय अतिथि ब्रह्मा के पास दुर्वासा की तरह आया । श्रान्त हुए उसने वहाँ पर विश्राम लिया । जैसे वसन्त फल, पुष्प, रस आदि से वृक्ष को परम प्रसन्नता को प्राप्त कराता है वैसे ही गाधि ने फल, पुष्प, रस और भोजन से उस अतिथि को प्रसन्नता को प्राप्त कराया