Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
ग्राम्या ऊचुः ।
यथा कथयसि ब्रह्मंस्तत्तथा न तदन्यथा ।
कटंजनामा श्वपच इहाभूद्दारुणाकृतिः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
ग्रामीणों ने कहा : हे ब्रह्मन्, जैसे आप कहते हैं वह ठीक वैसे ही है, उसमें कुछ भी हेर-फेर
नहीं है । यहाँ पर क्रूर आकृतिवाला कटंजनाम का चाण्डाल हुआ