Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 54–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 54,55
संस्कृत श्लोक
अत्र श्वपचमेकान्ते वासिनं वृद्धमुत्तमम् ।
स्मरस्येनं किमुत भो दुःखानामिव देहकम् ॥ ५४ ॥
यदि जानासि भोः साधो तन्मे कथय तत्त्वतः ।
पान्थ संशयविच्छेदे महत्पुण्यफलं स्मृतम् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सज्जन, यहाँ पर एकान्त में निवास करनेवाले
अतिवृद्ध चाण्डाल का, जो दुःखों की मूर्ति के समान था, क्या आपको स्मरण है ? हे साधो, यदि आप
उसको जानते हैं, तो यथार्थरूप से मुझसे कहिये । हे पथिक, सन्देह को निवृत्त करने में बड़ा पुण्य कहा
गया हे