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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 36

पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग दुर्लभ आत्मा को प्राप्तकर बारबार प्रणाम कर रहे प्रह्लाद का आत्मा की स्तुति, अभिनन्दन और जैसे प्रिया प्रिय के साथ एकान्त मेँ रमण करती है वैसे ही आत्मा के साथ एकान्त में रमण करना |

32 verse-groups

  1. Verses 1–3प्रह्माद ने कहा : मानुष आनन्द से लेकर हिरण्यगर्भ के आनन्दपर्यन्त सब सुखोत्कर्ष के स्थानों…
  2. Verses 4–7हे विश्वजनीन, आपने अपनी सत्ता से सकल विश्व को भर रक्खा है, अतः नित्य सब जगह आप दिखाई देते…
  3. Verses 8–10व्यवहार दृष्टि से हम दोनों का लहर ओर लहर के जल के समान जो यह भेद है, वह व्यवहारदृष्टि या…
  4. Verses 11–13इतने समय तक मेरे स्वरूप से आप ही मेरे अभिप्रायानुकूल चलने से श्रान्त हो गये हैं, इस समय आ…
  5. Verse 14हे देव, आज यह तुम मुझे मिल गये हो, मैने तुम्हें देख लिया है और मुझे तुम्हारा स्वरूप परिज्…
  6. Verses 15–19कैसे मैं देखा गया, ऐसा यदि कहो, तो चाश्चुष आदि सब वृत्तियों के प्रकाशन रूप से 'प्रतिबोधवि…
  7. Verses 20–21वेद- वेदांत के सिद्धान्त, तर्क, पुराण के गीत आदि से जिनका वर्णन हुआ वह विज्ञात आत्मा केसे…
  8. Verses 22–24येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः“ इस श्रुति के अनुसार भी कहते है । निर्मल दीपरूप तुमसे सूर्य प्र…
  9. Verses 25–26अव अखण्डार्थ में प्रमाणरूप से सम्पन्न अहं ओर त्वं शब्दों को नमस्कार करते हैं। लक्ष्य महात…
  10. Verse 27सम, निर्मल निराकार साक्षिभूत, दिशा काल आदि से अनवच्छिन्न स्वात्मरूप मुझ प्रत्यक्स्वभाव मे…
  11. Verse 28यदि कोई प्रश्न करे कि प्रत्यक्‌ स्वभाव मे ही रहते हैं, यह कैसे जाना ? तो इस पर कहते है ।…
  12. Verse 29आशारूपी रस्सी से खींचे गये, चर्म, मांस और हड्डियों से व्याप्त मनरूपी सारथि से युक्त शरीरर…
  13. Verse 30तो क्या आप प्राण आदिशक्ति हैं अथवा देह में स्थित अहंकार आदि हैं, ऐसी आशंका होने पर नहीं,…
  14. Verses 31–34मैं चिरकाल से भे" हुआ हूँ, चिरकाल से मुझे मेरा स्वरूप लाभ हुआ हे । जैसे प्रलय के अन्त में…
  15. Verse 35हे आत्मन्‌, फूलों में सुगन्ध की तरह, धौंकनी में वायु की तरह तथा तिलों में तेल की तरह इस श…
  16. Verses 36–39सर्वकर्ता भी तुम्हीं हो, ऐसा कहते हैं। निरहंकाररूप होते हुए आप दुष्टों का नाश करते हैं, स…
  17. Verses 40–43अब स्वयं मुक्त होकर अपने से अभिन्न बद्धात्मा के मोक्षोपाय का उपदेश देते हैं। बहुत प्रकार…
  18. Verse 44उसके उपाय भूत पूर्व पीठिका का उपदेश देते हैं। मान, महाकोप, कलुषता ओर कुटिलता का त्याग कीज…
  19. Verses 45–46आप जिन्होंने मनरूपी हाथी पर विजय प्राप्त कर ली हे, आज इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ों को जीतकर…
  20. Verses 47–48यदि ऐसा है, तो सर्वत्र मैं आपको क्यो नहीं देखता हूँ, ऐसी शंका होने पर कहते हैं । हे विभो,…
  21. Verse 49योगियों के उत्क्रमण के समय सुषुम्नादि मार्ग का प्रकाश भी तुम्हारे आधीन ही है, ऐसा कहते है…
  22. Verses 50–52आप देहरूपी फूलमें सुगन्ध हैं, देहरूपी चन्द्र में परमार्थ सत्यभूत अमृत हैं, देहरूपी शाखा म…
  23. Verses 53–61आप सब वायुओं के स्पन्दरूप हैं, मन रूपी हाथी के मद के तुल्य भ्रान्ति के निमित्त हे, ज्ञानर…
  24. Verses 62–67जैसे दर्पण आदि में प्रतिबिम्बित अपने मुख का सौन्दर्य कान्ताओं के चुम्बन आदि अर्थक्रिया प्…
  25. Verses 68–71दृष्टान्त में कथित की दुष्टान्तिक में योजना करते हैं। हे देव, इस प्रकार सुख-दुःख निर्दोष…
  26. Verse 72मिथ्याभूत वस्तुओं की क्षणस्थायिता भी नहीं घट सकती, ऐसी अवस्था में उन्हें अर्थक्रियाकारी क…
  27. Verse 73तो इस पर कहते हैं। जब उत्पन्न होते ही नष्ट हुई वस्तु अर्थक्रिया करेगी, तो यह लोक बिजलियों…
  28. Verse 74उक्त रीति से अत्यन्त दुर्घट भी सुख-दुःखादि संपत्ति को सुख-दुःख आदि की दुर्घटता जाननेवाले…
  29. Verse 75तब अविवेकियो में मैं कैसा हूँ, ऐसा प्रश्न होने पर तो कोई उत्तर नहीं है, क्योकि अविवेकियों…
  30. Verse 76आपकी अनन्तरूप और नामों की आस्पदता में कर्तत्वाध्यास ही मूल है, ऐसा कहते हैँ । चेष्टारहित,…
  31. Verses 77–79अब विवेकी और विवेकियो मे प्रसिद्ध दो रूपों से परमात्मा की स्तुति करते है । हे ब्रह्माण्ड…
  32. Verse 80त्वत्स्वरूप से स्थित होने पर मेरी सर्व अनर्थनिवृत्ति सिद्ध हो गई है, यो उपसंहार करते हैँ…