Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 40–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 40–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
भावानां भूरिभङ्गानामभवाय भवाय च ।
भव भावविमुक्तात्मा भावाभावबहिष्कृतः ॥ ४० ॥
जहि मानं महाकोपं कालुष्यं क्रूरतां तथा ।
न महान्तो निमज्जन्ति प्राकृते गुणसंकटे ॥ ४१ ॥
प्राक्तनीं दीर्घदौरात्म्यदशां स्मृत्वा पुनःपुनः ।
कोहं किं तद्बभूवेति हसन्मुक्ताच्छटासितम् ॥ ४२ ॥
ते प्रयाताः समारम्भा गतास्ते दग्धवासराः ।
येषु चिन्तानलज्वालाजालाकीर्णो भवानभूत् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब स्वयं मुक्त होकर अपने से अभिन्न बद्धात्मा के मोक्षोपाय का उपदेश देते हैं।
बहुत प्रकार के विकारपूर्ण स्वभाववाले पदार्थो के बाध के लिए और निरतिशयानन्दस्वरूप के
आविर्भाव के लिए असंगात्मदर्शन द्वारा भाव और अभावों से रहित होकर असंगतात्मभाव से ही सदा
विमुक्त होओ, फिर बन्ध को प्राप्त मत होओ