Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
प्रह्लाद उवाच ।
आत्मा सर्वपदातीतश्चिरात्संस्मृतिमागतः ।
दिष्ट्या लब्धोऽसि भगवन्नमस्तेस्तु महात्मने ॥ १ ॥
अभिवन्द्याथ चालोक्य चिरमालिङ्ग्यसे मया ।
कोऽन्यः स्यात्त्वदृते बन्धुर्भगवन्भुवनत्रये ॥ २ ॥
हंसि पासि ददासि त्वं स्तौषि यासि विवल्गसि ।
अयं प्राप्तोसि दृष्टोसि किं करोषि क्व गच्छसि ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रह्माद ने कहा : मानुष आनन्द से लेकर हिरण्यगर्भ के आनन्दपर्यन्त सब सुखोत्कर्ष के स्थानों से
भी बढ़कर आनन्दरूप प्रत्यगात्मा चिरकाल से मेरे स्मृतिपट पर आरूढ हुआ हे । हे भगवान्, तुम भाग्य
से मुझे प्राप्त हुए हो । अपरिच्छिन्न स्वभाववाले तुमको नमस्कार ह । दर्शन कर प्रणाम करके चिरकाल
तक समाधि में क्षीर-नीर की तरह सम्मिलित रूप से मेरे द्वारा आपका आलिंगन किया जाता है । हे
भगवान्, तीनों भुवनो में तुम्हारे सिवा मेरा कौन परम प्रिय होगा ? जब तक तुम मिलते नहीं, तुम्हारे
दर्शन नहीं होते तब तक मृत्यु होकर तुम अभक्तो का नाश करते हो ओर भक्तों की रक्षा करते हो,
उपासना आदिकर्मो से आराधित होकर वरदान देते हो, स्तुतिकर्ता आदि के रूप से स्तुति करते हो,
गमनकर्ता के रूप से चलते हो ओर सर्वरूप से व्यवहार करते हो । मैंने तो यह नित्य अपरोक्ष स्वभाव
आत्मा को पा लिया है ओर देख लिया है । अब मेरे प्रति क्या करते हो अथवा कहाँ जाते हो ? भाव यह
कि तुम इस समय पहले की नाई अन्यत्र नहीं जा सकते और कुछ कर नहीं सकते
सर्ग सन्दर्भ
पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग दुर्लभ आत्मा को प्राप्तकर बारबार प्रणाम कर रहे प्रह्लाद का आत्मा की स्तुति, अभिनन्दन और जैसे प्रिया प्रिय के साथ एकान्त मेँ रमण करती है वैसे ही आत्मा के साथ एकान्त में रमण करना |