Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 36–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 36-39
संस्कृत श्लोक
हंसि पासि ददासि त्वमवस्फूर्जसि वल्गसि ।
अनहंकृतिरूपोऽपि चित्रेयं तव मायिता ॥ ३६ ॥
जयामीशज्वलद्दीप्तिः सर्वमुन्मीलयञ्जगत् ।
जयाम्युपरतारम्भो जगद्भूयो निमीलयन् ॥ ३७ ॥
परमाणोस्तवैवान्तरिदं संसारमण्डलम् ।
वटत्वं वटधानायां बभूवास्ति भविष्यति ॥ ३८ ॥
हयद्विपरथाकारैर्यद्वत्खे दृश्यतेऽम्बुदः ।
तद्वदालोक्यसे देव पदार्थशतविभ्रमैः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वकर्ता भी तुम्हीं हो, ऐसा कहते हैं।
निरहंकाररूप होते हुए आप दुष्टों का नाश करते हैं, सज्जनों की रक्षा करते हैं, भक्तों को वरदान
देते हैं, गर्जते हैं और व्यवहार करते हैं, यह आपकी मायावत्ता बड़ी विचित्र है । सृष्टि के समय में
चिदात्मरूप आपसे बाहर-भीतर पदार्थो के प्रकाश द्वारा प्रदीप्त हुआ मैं जीवरूप से प्रवेश कर नाम-
रूपात्मक सम्पूर्ण जगत् को रचता हुआ तुम्हारे ही स्वरूप से वशीभूत वस्तुतः रच करके पालता हूँ।
प्रलयकाल में उपरत-व्यापार होकर मैं फिर जगत् का उपसंहार करता हुआ तुम्हारे स्वरूप से ही
उसका विनाश करता हूँ। जैसे वट के बीज के अन्दर वटता पहले थी, है और होगी वैसे ही परमाणुरूप
के अन्दर यह संसार मण्डल था, है और होगा जैसे आकाश में बादल घोड़े, हाथी और रथों के आकार
में दिखाई देता है वैसे ही हे देव, आप भी सैकड़ों पदार्थों के रूप से दिखाई देते हैं