Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verse 75
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verse 75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 75
संस्कृत श्लोक
अविवेकिषु योऽसि त्वं सहजात्मन्यदृच्छया ।
तद्रूपकथनेनालं ममानल्पपदास्पद ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब अविवेकियो में मैं कैसा हूँ, ऐसा प्रश्न होने पर तो कोई उत्तर नहीं है, क्योकि अविवेकियों की
कल्पना अनन्त ओर अनियत हैं, ऐसा कहते हैं।
हे सहजात्मन्, अविवेकियों में आकस्मिक विविध वासनाओं के उदय से आप जो हो, हे अनन्तरूपों
और नामों के आस्पद, उनके स्वरूपकथन में मेरी वाणी समर्थ नहीं हैं