Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 47–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 47–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 47,48
संस्कृत श्लोक
सर्वदैवासि संसुप्तः शक्त्या संबोध्यसे विभो ।
भोगालोकनलीलार्थं कामिन्या कामुको यथा ॥ ४७ ॥
दृक्क्षुद्राभिरुपानीतं दूराद्रूपमधु त्वया ।
पीयते स्वीकृतं शक्त्या नेत्रवातायनस्थया ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है, तो सर्वत्र मैं आपको क्यो नहीं देखता हूँ, ऐसी शंका होने पर कहते हैं ।
हे विभो, आप सर्वदा, सुप्त हो, जैसे कामिनी द्वारा भोगालोकन लीला के लिए कामुक प्रबोधित
होता है वैते ही भोक्ता का अदृष्ट शक्ति से भोगालोकन क्रीडा के लिए केवल उतने प्रबोध को आप
प्राप्त होते ही पूर्णात्मरूप से प्रबोध को प्राप्त नहीं होते । इन्द्रियवृत्तिरूपी मधुमक्खियों द्वारा दूर से
अतीत तथा नेत्ररूपी झरोखे पर बैठी हुई चित्-शक्ति से स्वीकृत उपाधिरूप शहद आपके द्वारा पिया
जाता हे