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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 50–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 50–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 50-52

संस्कृत श्लोक

देहपुष्पे त्वमामोदो देहेन्दौ त्वमृतामृतम् । रसस्त्वं देहविटपे शैत्यं देहहिमे भवान् ॥ ५० ॥ त्वय्यस्ति विस्मयस्नेहः शरीरक्षीरसर्पिषि । त्वमन्तरस्य देहस्य दारुण्यग्निरिव स्थितः ॥ ५१ ॥ त्वमेवानुत्तमास्वादः प्राकाश्यं तेजसामपि । अवगन्ता त्वमर्थानां त्वं भासामवभासकः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

आप देहरूपी फूलमें सुगन्ध हैं, देहरूपी चन्द्र में परमार्थ सत्यभूत अमृत हैं, देहरूपी शाखा में रागादिरूपी पल्‍लवों की उत्पत्ति में निमित्तभूत रस हैं और देहरूपी हिम में शीतलता हैं। सब प्राणियों के शरीर में गर्व का निमित्तभूत जो स्नेह है, वह शरीररूप दूध के घी के सदृश सारभूत आप ही है। जैसे काष्ठ में अग्नि स्थित रहती है वैसे ही देह के अन्दर आप स्थित है। आप ही सर्वोत्तम स्वाद (अति मधु अमृतस्वरूप) हे । सूर्यादि ज्योतियों के भी प्रकाश निमित्त आप ही हैँ । पदार्थों के ज्ञाता तथा चक्षु आदि इन्द्रियों के अवभासक आप ही हैं