Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 68–71
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 68–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 68-71
संस्कृत श्लोक
तदेवं सुखदुःखश्रीर्दृष्ट्वैव त्वामनामयम् ।
जायते जातमात्रैवं सर्वनाशेन नश्यति ॥ ६८ ॥
भङ्गुरत्वादिह स्थातुं कालं नाणुमपि क्षमा ।
निमेषलक्षभागाख्या तन्वी कालकला यथा ॥ ६९ ॥
गान्धर्वी नगरी तन्वी सुखदुःखादिभावना ।
स्फुरति त्वत्प्रसादेन त्वयि दृष्टे विलीयते ॥ ७० ॥
त्वदालोकेक्षणोद्भूता त्वदालोकेक्षणक्षया ।
मृतेव जाता जातेव मृता केनोपलक्ष्यते ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त में कथित की दुष्टान्तिक में योजना करते हैं।
हे देव, इस प्रकार सुख-दुःख निर्दोष आपको देखकर ही उत्पन्न होते हैं । पूर्वोक्त रीति से उत्पन्न
होते ही बीजभाव के साथ नष्ट हो जाते हैं । जैसे निमेष के लाखवें हिस्से के रूप से प्रसिद्ध अतिसूक्ष्म
काल-कला स्वतः ही नष्ट हो जाती है वैसे ही सुख-दुःख भी विषयों के हटने के कारण स्वतः भंगुर होने
से इस नित्य निरतिशय आनन्द प्रकाशरूप आत्मा में क्षणभर भी रह नहीं सकते | इसी प्रकार अतिसूक्ष्म
काल होने के कारण न दिखाई देनेवाली और गन्धर्वनगरी के समान मिथ्याभूत भी सुख-दुःखादि की
भावना अज्ञात आपके प्रसाद से सत्य-सी प्रतीत होती है, किन्तु आपका साक्षात्कार होने पर विलीन हो
जाती है। अज्ञात आपके प्रकाशरूप दुष्ट चक्षु से उत्पन्न हुई और सुज्ञात आपके प्रकाशरूप चक्षु से
क्षीण हुई यह सुख-दुःखादि की भावना मर कर स्वप्न में फिर उत्पन्न हुई-सी स्वप्न में उत्पन्न होकर
जाग्रत में फिर मरी हुई-सी किसके द्वारा देखी जा सकती है ?