Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डकोटराध्वान्ताः प्राणापानपरैस्त्वया ।
गतागतैर्ब्रह्मपुरे संप्रेक्ष्यन्ते प्रतिक्षणम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
योगियों के उत्क्रमण के समय सुषुम्नादि मार्ग का प्रकाश भी तुम्हारे आधीन ही है, ऐसा कहते है ।
प्राण ओर अपान के निरोध में तत्पर योगियों द्वारा ब्रह्मप्राप्ति का स्थान होने के कारण ब्रह्मपुररूप
देह में प्रतिक्षण अभ्यस्त हृदय में एकत्र प्राणो को निकालकर परकायप्रवेश, अन्य स्थान में संचार आदि
के अनुकूल विविध नाड़ी मार्गौ में गमनागमन द्वारा (संचार द्वारा) अन्य ब्रह्माण्ड मेँ जाने के लिए अथवा
अर्चिरादि मार्गो से सूर्यमण्डल में जाने के लिए ब्रह्मरन्ध्र के सम्बन्धी सुषुम्ना आदि मार्ग के पूर्व स्वयं
ज्योति आपके द्वारा देखे जाते हैं।
हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतनेनैष आत्मा निष्क्रामति |
इस श्रुति के अनुसार यद्यपि सब लोगों के मरण में नाड़ी के द्वार का प्रकार आत्मज्योति के अधीन
ही है तथापि अयोगियों में पीड़ा परवशता आदि द्वारा उसकी अवधानशक्ति न रहने के कारण और
योगियों के मरण समय में या अभ्यासकाल में सावधान रहने के कारण वे ही कहे गये हैं