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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 77–79

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 77–79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 77-79

संस्कृत श्लोक

जय प्रोड्डामराकार जय शान्तिपरायण । जय सर्वागमातीत जय सर्वागमास्पद ॥ ७७ ॥ जय जात जयाजात जय क्षत जयाक्षत । जय भाव जयाभाव जय जेय जयाजय ॥ ७८ ॥ उल्लसाम्युपशाम्यामि तिष्ठाम्यधिगतोऽस्मि च । जयी जयाय जीवामि नमो मह्यं नमोऽस्तु ते ॥ ७९ ॥

हिन्दी अर्थ

अब विवेकी और विवेकियो मे प्रसिद्ध दो रूपों से परमात्मा की स्तुति करते है । हे ब्रह्माण्ड आदि अतिविस्तृत आकारवाले, आपकी जय हो, हे शान्तिपरायण, आपकी जय हो, हे भगवान्‌, आप सब प्रमाणो से परे हैं आपकी जय हो; हे भगवान, आप सब प्रमाणो से वेद्य है आपकी जय हो, हे जात (उत्पन्न हुए), आपकी जय हो; अजात (अजन्मा), आपकी जय हो, हे क्षत, हे अक्षत, आपकी जय हो । हे भाव, आपकी जय हो, हे अभाव, आपकी जय हो, हे जय, आपकी जय हो, हे अजेय, आपकी जय हो । मैं उल्लास को प्राप्त हो रहा हूँ, निर्वाण को प्राप्त हो रहा हूँ, स्थित हूँ, ज्ञाततत्त्व हूँ, आविद्यकरूप पर जय पाने के कारण मैं जयी हू । प्रारब्ध शेष के भी जय के लिए जी रहारहू। प्रत्यगात्मरूप मुझको नमस्कार है, ब्रह्मरूप तुम्हें नमस्कार है