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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

वाच्यवाचकदृष्ट्यैव भेदो योऽयमिहावयोः । असत्या कल्पनैवैषा वीचिवीच्यम्भसोरिव ॥ ८ ॥ त्वमेवानन्तयानन्तवस्तुवैचित्र्यरूपया । भावाभावविलासिन्या नित्ययैव विजृम्भसे ॥ ९ ॥ नमो द्रष्ट्रे नमः स्रष्ट्रे नमोऽनन्तविकासिने । नमः सर्वस्वभावाय नमस्ते सर्वगात्मने ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

व्यवहार दृष्टि से हम दोनों का लहर ओर लहर के जल के समान जो यह भेद है, वह व्यवहारदृष्टि या भेद असत्य कल्पना ही हे । प्रवाह से अनादि, भाव ओर अभावं से विकसित होनेवाली, अनन्त वस्तुओं की विचित्रता से पूर्ण स्वरूपवाली अनन्त कल्पना से आप ही विस्तार को प्राप्त हुए हैँ । पहले प्रष्टव्य (सृष्टि करने योग्य) पदार्थो का दर्शन करनेवाले आपको नमस्कार है तदनन्तर म्रष्टव्य पदार्थो की सृष्टि करनेवाले आपको नमस्कार है ओर सृष्टि करके अनन्तरूपो से विकास को प्राप्त होनेवाले आपको नमस्कार है अतएव सर्वरवभाव और अधिष्ठानरूप से सर्वव्यापी आपको नमस्कार है