Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अद्य त्वं देहनगरे राजा स्फारमनोरथः ।
न दुःखैर्गृह्यसे नापि सुखैर्व्योम करैरिव ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके उपाय भूत पूर्व पीठिका का उपदेश देते हैं।
मान, महाकोप, कलुषता ओर कुटिलता का त्याग कीजिये । महापुरुष प्राकृतिक गुण संकट में नहीं
गिरते । मैं कौन हूँ, क्या हो गया, ऐसा विचार कर मोतियो के कणों के समान सफेद हँसी हँसते हुए अपनी
पूर्वजन्म की दीर्घ दुरात्मा दशा का बार-बार स्मरण करके उसका त्याग कर दीजिये । वे कार्य बीत चुके,
वे बुरे दिन चले गये, जिनमें आप चिंतारूप अग्नि की अनेक ज्वाला से आक्रान्त हुए थे ॥४ १-४ ३॥ आप
देहरूपी नगर में विफल मनोरथवाले राजा के समान स्थित हे । जैसे आकाश मुष्टियों से नहीं पकड़ा जाता
वैसे ही आप दुःखो से गृहीत नहीं होते