Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 11–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
प्रतिजन्म चिरं बह्व्यो दीर्घदुःखवता मया ।
त्वया मयोपदिष्टेन दग्धेनापहतौजसा ॥ ११ ॥
आलोकिता लोकदृशो दृष्टा दृष्टान्तदृष्टयः ।
न प्राप्तस्तत्त्वयाऽनेन किंचिदासादितं भवेत् ॥ १२ ॥
सर्वं मृत्काष्ठपाषाणवारिमात्रमिदं जगत् ।
नेहास्ति त्वदृते देव यत्प्राप्तौ नाभिवाञ्छति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इतने समय तक मेरे स्वरूप से आप ही मेरे अभिप्रायानुकूल चलने से श्रान्त हो गये हैं, इस समय
आपने ही अपने को विश्राम के लिए प्राप्त कर लिया है, ऐसा कहते हैं।
मद्भाव को (जीवभाव को) प्राप्त हुए त्वत्स्वरूप मेने, जो अपने कामादिदोषों, के अनुसार उपदिष्ट
असन्मार्ग में प्रवृत्त होने के कारण नष्ट हुआ अतएव तिरोहित आत्मभाववाला तथा दीर्घ दुःख का
भाजन हुआ, प्रत्येक जन्म में चिरकाल तक ऊपर, नीचे ओर मध्य लोको में बहुत से संसारभ्रम देखे
तथा उनमें विवेक के अनुकूल दृष्टान्त दृष्टियाँ देखी। उस बहिर्लोक के दर्शन से आपने अपने को प्राप्त
नहीं किया । तीनों लोको के दर्शन से तनिक भी पुरुषार्थरूप प्राप्त नहीं हुआ । यह सारा जगत् मिट्टी,
काष्ठ, पत्थर और जलमात्र हे । हे देव, जिसकी प्राप्ति होने पर पुरुषार्थच्छा पूर्ण होती है, ऐसी वस्तु
आपके सिवा इस जगत् में दूसरी नहीं हे