Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 53–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 53–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 53-61
संस्कृत श्लोक
स्पन्दस्त्वं सर्ववायूनां त्वं मनोहस्तिनो मदः ।
प्रज्ञानलशिखायास्त्वं प्राकाश्यं तैक्ष्ण्यमेव च ॥ ५३ ॥
त्वद्वशादियमात्मीया वाचा संप्रविलीयते ।
दीपवत्पुनरन्यत्र समुदेति कुतोऽपि सा ॥ ५४ ॥
त्वयि संसारवर्तिन्यः पदार्थावलयस्तथा ।
कटकाङ्गदकेयूरयुक्तयः कनके यथा ॥ ५५ ॥
भवानयमयं चाहंत्वंशब्दैरेवमादिभिः ।
स्वयमेवात्मनात्मानं लीलार्थं स्तौषि वक्षि च ॥ ५६ ॥
मन्दानिलविनुन्नोऽब्दो गजाश्वनरदृष्टिभिः ।
यथा संलक्ष्यते व्योम्नि तथा त्वं भूतदृष्टिभिः ॥ ५७ ॥
यथा हयगजाकारैर्ज्वाला लसति वह्निषु ।
तथैवाव्यतिरिक्तैस्त्वं दृश्यसे भुवि सृष्टिषु ॥ ५८ ॥
त्वं ब्रह्माण्डकमुक्तानामच्छिन्नस्तन्तुराततः ।
क्षेत्रं त्वं भूतसस्यानां चिद्रसायनसेवितम् ॥ ५९ ॥
असत्तदनभिव्यक्तं पदार्थानां प्रकाश्यते ।
त्वया तत्त्वं यथा पक्त्या मांसानां स्वादवेदनम् ॥ ६० ॥
विद्यमानापि वस्तुश्रीर्न स्थिता त्वयि न स्थिते ।
वनितारूपलावण्यसत्तेव गतचक्षुषः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
आप सब वायुओं के स्पन्दरूप हैं, मन रूपी हाथी के मद के तुल्य भ्रान्ति के निमित्त हे, ज्ञानरूपी
अग्निशिखा के प्रकाश निमित्त ओर उष्णता निमित्त हैं यह आत्मीय वाणी भी आपके उपसंहार से ही
मरण, मूर्च्छा और स्वप्न में दीपक के समान लीन हो जाती है फिर देहान्तर में कहीं से उदित हो जाती
हँ । जैसे सुवर्ण मे कड़ा, वाजूबन्द आदि आभूषण आविर्भूत होते हैं वैसे ही संसार में स्थित पदार्थ
राशियाँ आप में ही उदित होती हैं । आप ही क्रीडा के लिए स्वयं अपने से अपनी आप, यह, तुम, मेँ
आदि शब्दों से स्तुति करते हैं और कहते हैं यानी आप ही अपने में त्वम्, अहं आदि शब्दों से व्यवहार
करते हैं आपसे अन्य कोई नहीं है । जसे मन्द वायु से हिलाया जा रहा मेघ हाथी, घोडे, मनुष्य आदि
आकारो से दिखाई देता हे वैसे ही आप विविध जीवों के आकारो से दिखाई देते हैं | जैसे अग्नियों में
ज्वाला हाथी ओर घोड़े के आकार से शोभित होती है वैसे ही पृथिवी में विविध सृष्टियों में आप अपने
से अभिन्न जीवों के आकार में दिखाई देते हैं । आप ब्रह्माण्डरूपी मोतियों के अविच्छिन्न दीर्घं तन्तु
और भूतरूप धान्यों के चैतन्यरूपी रसायन से सींचे हुए क्षेत्र हैं। अनभिव्यकत अतएव असत्यप्राय
विद्यारूप बीज के अन्दर स्थित स्रष्टव्य पदार्थों का वह प्रसिद्धस्वरूप आप से सृष्टि द्वारा ऐसे प्रकाशित
किया जाता है जैसे कि पकने से मांसों की आस्वादन के योग्य स्वादुता प्राप्त होती है। जैसे कि अन्धेके
लिए वनिता की विद्यमान रूपलावण्य सत्ता भी विद्यमान नहीं रहती वैसे ही आपके स्थित न होने पर
विद्यमान भी वस्तु शोभा स्थित नहीं रहती