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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 45–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 45, 46

संस्कृत श्लोक

अद्येन्द्रियदुरश्वांश्च जित्वा जितमनोगजः । भोगारिमभितो भङ्क्त्वासाम्राज्यमधितिष्ठसि ॥ ४५ ॥ अपाराम्बरपान्थस्त्वमजस्रास्तमयोदयः । अवभासकरो नित्यं बहिरन्तश्च भास्करः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

आप जिन्होंने मनरूपी हाथी पर विजय प्राप्त कर ली हे, आज इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ों को जीतकर भोगरूपी शत्रु को चारों ओर से चूर्ण -विचूर्णं कर साम्राज्य सिंहासन पर स्थित हे । अपार आकाश के पथिक आप जिनसे निरन्तर जगत्‌ का उदय ओर अस्त होता है, नित्य बाहर और भीतर प्रकाश करनेवाले सूर्य हैं। सूर्य भी अपार आकाश के पथिक हैं ओर नित्य उनका उदय और अस्त होता है तथा वह प्रकाशक भी हैं