Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 46
पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग जिन गुणों से संसार में विहार करता हुआ भी निमग्न नहीं होता और जो जीवन्मुक्त लोगों में स्थित है, उन गुणों का श्रीरामचन्द्रजी के लिए उपदेश |
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- Verse 1सब वस्तुओं में अनास्था द्वारा नष्ट की उपेक्षा और प्राप्त की अनाकांक्षारूप गुणों का पहले उ…
- Verse 2गन्धर्वनगर के पदार्थो के नष्ट -भ्रष्ट या भूषित होने पर ओर अविद्याजनित पुत्र आदि के नष्ट य…
- Verse 3रमणीय धन ओर स्त्री, पुत्र आदि समृद्धि होने पर हर्ष का अवसर ही क्या है ? मृगतृष्णा के वृद्…
- Verse 4धन और स्त्री -पुत्र आदि के बढ़ने पर दुःखी होना ही उचित है ओर सन्तुष्ट होना उचित नहीं है ।…
- Verse 5वृद्धि को प्राप्त जिन भोगों से मूर्ख को राग होता है, वृद्धि को प्राप्त उन्हीं भोगों से वि…
- Verse 6नश्वर स्वभाववाले धन, स्त्री, पुत्र आदि के विषय में हर्ष का अवसर ही क्या है ? जो साधु पुरु…
- Verse 7इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार के व्यवहारो में तत्त्वज्ञ आप जो-जो वस्तु नष्ट हो, उसकी उप…
- Verse 8अप्राप्त भोगों की सच्ची अनिच्छा ओर प्राप्त भोगों का भोग यही पण्डित का लक्षण है
- Verse 9संसार में भटकानेवाले, मारने के लिए गुप्त छिपे हुए, विष, शस्त्र अग्नि आदि द्वारा मारने के…
- Verse 10प्रपंचरहित ब्रह्म में विवेक, वैराग्य, ज्ञान में अप्रमाद आदिगुणों के अर्जनक्रम से जो सम्यक…
- Verse 11जिस किसी भी युक्ति से जिस पुरुष का दृश्य से अनुराग चला गया, उसकी परमार्थ मेँ अभिनिवेश रखन…
- Verse 12जिसकी “यह सत् है” यों सब वस्तुओं में आस्था निवृत्त हो गई, उस सर्वज्ञ को अवास्तविक अविद्य…
- Verse 13मैं और यह सम्पूर्ण जगत एक ही है, ऐसी जिनकी बुद्धि आस्था ओर अनास्था का त्याग करके स्थित है…
- Verse 14सत् ओर असत् में अनुगत सत्तामात्र प्रत्यगात्मरूप सत् का बुद्धि से अवलम्बन करके बाह्य और…
- Verse 15हे श्रीरामचन्द्रजी, अत्यन्त वैराम्ययुक्त, आत्मनिष्ठ, सब प्रकार के निवासों से रहित आप अपने…
- Verse 16कर्म कर रहे जिस ज्ञानी की कर्म में न तो इच्छा है और न अनिच्छा है उसकी बुद्धि जल से कमल के…
- Verse 17बाधित वस्तु में अनुवृत्तिशील होने से गोण इन्द्रियों से युक्त आपका मन दर्शन, स्पर्शन आदि क…
- Verse 18डइन्द्रियार्थों में ममता त्यागरूप गुण का उपदेश देते हुए उसमें अनास्था का उपपादन करते हैं।…
- Verse 19हे रामचन्द्रजी, जब आपके हृदय में इन्द्रियार्थ सम्पत्तियाँ स्वादु नहीं लगेगी, तब आप ज्ञातज…
- Verse 20जिनको ऐहिक और पारलौकिक विषय अरुचिकर हों , ऐसे आप चाहे देह के भानवाले हो, चाहे समाधि द्वार…
- Verse 21जीवन्मुक्ति में वासनाओं से चित्त को बाहर करना ही मुख्य साधन है, ऐसा कहते है । हे श्रीरामच…
- Verse 22वासनारूपी जल से व्याप्त इस संसाररूपी समुद्र में जो लोग प्रज्ञारूपी नाव में चढ़े, वे पार ह…
- Verse 23वह प्रज्ञारूपी नाव कैसी है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उसे वशति हैं। विवेक, वैराग्य आदि से तीक्ष…
- Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञान से उदार चित्तवाले तत्त्वज्ञानी प्राज्ञ पुरुष जिस प्रकार बर्ताव…
- Verse 25नित्यतृप्त, महाबुद्धि, जीवन्मुक्त महात्मा ओं का सदाचार से अनुसरण करना चाहिये, भोगलम्पट मू…
- Verse 26ब्रह्मतत्त्व ओर जगत्तत्त्व को जाननेवाले पुरुष न तो जगत के व्यवहार का त्याग करते हैं और न…
- Verse 27यदि कोई कहे, ज्ञानवार्नो की भी कहीं पर फललिप्सा हो सकती है, तो इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं ।…
- Verse 28महात्मा पुरुषों को सूर्य के समान सर्वनाश होने पर भी खेद नहीं होता, सम्पूर्ण अभिलाषाओं से…
- Verse 29बैठे हुए, आत्मनिष्ठ हो 'विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः“ (विज्ञानरूपी सारथिवाला, म…
- Verse 30मुझमें वे गुण हैं या नहीं, इस प्रकार संदेह मे पडे हुए श्रीरामचन्द्रजी को ढाढ़स देते है ।…
- Verses 31–32स्पष्ट दृष्टि का अवलम्बन करके मानरहित ओर मात्सर्यरहित आप इस पृथ्वी तल में विहार कीजिये, आ…
- Verse 33हे निष्पाप, अपने स्वरूप में स्थित, सब इच्छाओं के त्याग से युक्त वासना विषयक कौतुक दर्शन क…