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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । रम्ये धनेषु दारादौ शोकस्यावसरो हि कः । इन्द्रजालेक्षणाद्दृष्टे नष्टे का परिदेवना ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सब वस्तुओं में अनास्था द्वारा नष्ट की उपेक्षा और प्राप्त की अनाकांक्षारूप गुणों का पहले उपदेश देनेवाले श्रीवसिष्ठजी पूर्वोक्‍्त प्रस्ताव का उसमें उपयोग दशति हैं। रम्य धन और स्त्री आदि के नष्ट होने पर शोर का अवसर ही क्या है ? इन्द्रजाल से दृष्ट वस्तु के नष्ट होने पर विलाप की बात ही क्या है ?

सर्ग सन्दर्भ

पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग जिन गुणों से संसार में विहार करता हुआ भी निमग्न नहीं होता और जो जीवन्मुक्त लोगों में स्थित है, उन गुणों का श्रीरामचन्द्रजी के लिए उपदेश |