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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

सुशून्येऽपि न खिद्यन्ते देवोद्याने नसङ्गिनः । नियतिं च न मुञ्चन्ति महान्तो भास्करा इव ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

महात्मा पुरुषों को सूर्य के समान सर्वनाश होने पर भी खेद नहीं होता, सम्पूर्ण अभिलाषाओं से परिपूर्ण नन्दनवन आदि में भी वे आसक्त नहीं होते ओर शास्त्रमर्यादा का कभी त्याग नहीं करते । सूर्य भी शून्य आकाश में खिन्न नहीं होते, नन्दनवन मेँ आसक्त नहीं होते और अपने मार्ग की मर्यादा का त्याग नहीं करते