Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्थं गिरा विमलया विमलाशयस्य रामो मुनेः सपदि मृष्ट इवाबभासे ।
ज्ञानामृतेन मधुरेण विराजितान्तः पूर्णः शशाङ्क इव शीतलतां जगाम ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे निष्पाप, अपने स्वरूप में
स्थित, सब इच्छाओं के त्याग से युक्त वासना विषयक कौतुक दर्शन की इच्छा जिसकी नष्ट हो गई,
ऐसे होकर आप अपने हृदय में परम शीतलता का ग्रहण कर विहार कीजिये ।३२॥
उपदिष्ट रहस्यों के, श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में उनमें, आविभवि को दशति हैँ ।
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : निर्मल आशयवाले मुनि श्रीवसिष्ठजी की इस प्रकार की निर्मल वाणी से
श्रीरामचन्द्रजी साफ किये हुए दर्पण के समान तुरन्त सुशोभित अतिमधुर ज्ञानामृत से विराजमान
अन्तःकरण से युक्त हुए वे चन्द्रमा की तरह शीतलता को प्राप्त हुए