Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
आस्वादितेन्द्रियार्थस्य सतनोरतनोरपि ।
अनिच्छतोऽपि संपन्ना मुक्तिरर्थवशात्तव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जिनको ऐहिक और
पारलौकिक विषय अरुचिकर हों , ऐसे आप चाहे देह के भानवाले हो, चाहे समाधि द्वारा देहके भान से
शून्य हों, आपके न चाहने पर भी मुक्ति अनायास प्राप्त हो गई