Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 46, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
दर्शनस्पर्शनादीनि मा करोतु करोतु च ।
तवेन्द्रियमनो गौणं त्वमनिच्छो भवात्मवान् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
बाधित वस्तु में अनुवृत्तिशील होने से गोण इन्द्रियों से युक्त आपका मन दर्शन,
स्पर्शन आदि करे चाहे न करे, किन्तु आप आत्मवान् होकर इच्छा रहित होइये