Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 31
तीसवाँ सर्ग समाप्त इकतीसवाँ सर्म अहंकार से अर्थहानि और अनर्थ प्राप्ति कहकर दामादि की सत्ता ओर असत्ता का निराकरण ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : इसलिए हे महामति श्रीरामचन्द्रजी, आपको सरलता से समझाने के लिए दाम-व्…
- Verse 2विवेक का अनुसन्धान न होने से चित्त इस प्रकार की आपत्ति को अनन्त जन्मरूपी दुःख के लिए अनाय…
- Verse 3कहाँ तो देवताओं का विनाश करनेवाली शम्बरासुर की सेनाओं का सेनापतित्व और कहाँ वनाग्नि के ता…
- Verse 4कहाँ देवताओं की सेना को भगानेवाला वह महान धैर्य और कहाँ किरात राज की क्षुद्र सेवकता ?
- Verse 5कहाँ निरहंकार चिन्मय सत्व की उदार धीरता और कहाँ मिथ्या वासना के आवेश से अहंकार की कुकल्पन…
- Verse 6शाखाओं के विस्तार से गहन, चारों ओर फैली हुई, भौंरों से भरी हुई संसार रूपी यह विषलता अहंका…
- Verse 7इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अपने अन्तःकरण से अहंकार को प्रयत्नपूर्वक हटा दीजिये। मैं कुछ…
- Verse 8अहंकार की अनर्थ हेतुता कह कर वह पुरुषार्थ का विघात भी करती है, ऐसा कहते हैं। अहंकाररूपी म…
- Verse 9माया के माहात्म्य से दानव बने हुए दाम, व्याल और कट ये तीनों यद्यपि जन्म- मरण प्रवाह की सत…
- Verse 10हे श्रीरामचन्द्रजी, इस समय वे काश्मीर देश में गहन वन की तलैया में सेवार के टुकड़ों के अभि…
- Verse 11असन्तोऽपि गतास्सत्ताम् यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उसकी अनुपपत्ति की शंका करते हैं । श्रीरा…
- Verse 12अपने विशेष अभिप्राय को कहने के लिए श्रीवस्रिष्ठजी पहले श्रीरामचन्द्रजी की शंका का स्वीकार…
- Verse 13भले ही ऐसा हो, पर ऐसी अवस्था में अनात्मवस्तुओं में सत्ता और असत्ता के विभाग का निरूपण ही…
- Verse 14श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, ये हम लोग सत् होकर ही स्थित है। असत् भी दाम आदि सत्…
- Verses 15–16यदि व्यावहारिक प्रमाणों के व्यवहारयोग्य होने के कारण हम लोगो के शरीरों की आप सत्ता मानते…
- Verse 17स्वप्न में अनुभूत अपना मरना जैसे अलीक (अवास्तविक) है, वैसे ही अनुभूत होता हुआ भी असद्रूप…
- Verse 18जैसे मरा हुआ अपना बन्धु स्वप्न में दृष्टिगोचर भी हो जाय, तो भी यह मर गया है, ऐसा यदि ज्ञा…
- Verse 19जिसे जगत की सत्यता का पूर्ण निश्चय है, वह अत्यन्त मूढ है, उसके प्रति यह जगत की असत्यता का…
- Verse 20इसी प्रकार पूर्वोत्पन्न कुसंस्कारों का नाश शात्त्रार्थ तत्व के अभ्यास के बिना उदित नहीं ह…
- Verse 21अतएव अनधिकारी पुरुष में उपदेशवचन उन्मत्त के प्रलाप के तुल्य होने से अज्ञ ओर अभिज्ञ दोनों…
- Verse 22यदि अज्ञो को उपदेश न दे और अज्ञोके साथ अज्ञचेष्टा से ही ज्ञानी भी व्यवहार करे, तो वह भी अ…
- Verse 23इसलिए भी अज्ञ को उपदेश नहीं देना चाहिए, ऐसा कहते है। जैसे शव अपने चरणों से भ्रमण नहीं कर…
- Verse 24तमेत वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा नाशकेन “इस श्रुति से ज्ञान में अ…
- Verse 25तब कहाँ पर उपदेश वचन सुशोभित होते है, इस पर कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, यह उपदेश वाणी अ…
- Verse 26मैं हूँ", यह बोध करने की शक्ति न होने से जैसे अहंब्रह्मास्मि“ इस वाक्यार्थ बोध में पूर्ण…
- Verse 27यदि कोई शंका करे सुवर्ण में अँगूठी के अपलाप की तरह अहंकार का ही ब्रह्म में अपलाप ज्ञानी क…
- Verse 28ज्ञानी की ष्टि से जगत की तरह अज्ञानी की दृष्टि से परमार्थ भी अत्यन्त असत् है, इसलिए उसे…
- Verses 29–30उक्त विषय को ही संक्षेप से स्पष्टतया कहते हैं। मूढ मिथ्या अहंकारमय है और ज्ञानी एकमात्र स…
- Verse 31जिसे अन्य आत्मा का (संसारी देहात्मा का) निश्चय है उसे अन्य आत्मा का (असंसारी आत्मा का) उप…
- Verse 32तब क्या सत्य है ? उसे कहते हैं। शुद्ध, सर्वगत, शान्त, निर्विकार चिदाकाश ज्ञान के समान शास…
- Verse 33सारा जगत उपरत हो गया। शंका : क्या ऐसा उपरत हुआ कि शून्य ही शेष रह गया ? समाधान : नहीं शून…
- Verse 34जैसे तिमिर रोग से पीड़ित आँखवाले पुरुष की स्वाभाविक ही दृष्टियाँ केशों के वर्तुलाकार गोलो…
- Verses 35–36वह सत्यात्मा अपने आत्मा को जिस-जिस प्रकार से जानता है ठीक उसी प्रकार से एक क्षण में अनुभव…
- Verses 37–39बन गई
- Verse 40जहाँ पर हम लोगों के स्वरूप से संवित् स्वयं उदित हुई, वहाँ पर वह वैसे आकार के अनुभव से वै…
- Verse 41जैसे मरुस्थल की सूर्यकिरण के ताप की मृगतृष्णारूपता होती है वैसे ही अपने स्वप्न के तुल्य च…
- Verse 42जगत के विषय में जागरुक "बाह्यपदार्थज्ञानरूप' जो चिदाकाश है, उसका उसीने दृश्य नाम रखा है,…
- Verse 43ये तो दूसरे को समझाने के लिऐ दो अवस्था सादृश्य की कल्पना से कही गई है, वास्तविक जो स्थिति…
- Verse 44जव एकमात्र चिदाकाश ही दृश्य है, तब सृष्टि और मोक्ष का भेद ही न रहा ऐसा कहते है । निर्वाण…
- Verse 45जैसे तिमिर रोग से पीडित नेत्र केशों का वर्तुलाकार गोला सा देखता है वैसे ही अज्ञानोपहित आत…
- Verses 46–47किन्तु वह केशों का वर्तुलाकार गोला कुछ भी नहीं है, वह दृष्टि ही वैसी स्थित हे, इसी प्रकार…
- Verse 48स्फटिक शिला के मध्य भाग के समान शून्याकार प्रतीत होता हुआ भी घन, शान्त, निर्मल महाचिति का…