Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
स्वस्वप्नप्रतिभासस्य जगदित्यभिधा कृता ।
चिद्व्योम्नो व्योमवपुषस्तापस्येव मृगाम्बुता ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मरुस्थल की सूर्यकिरण के ताप की मृगतृष्णारूपता होती है
वैसे ही अपने स्वप्न के तुल्य चिदाकाश के शून्य शरीर का चिदाकाश ने ही जगत यह नाम रख छोड़ा
है