Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
परस्माद्व्यतिरेकेण नाहमात्मनि किंचन ।
हेमनीवोर्मिकादित्वं न मय्यस्ति विशिष्टता ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे सुवर्ण में अँगूठी के अपलाप की तरह अहंकार का ही ब्रह्म में अपलाप ज्ञानी
क्यों नहीं करता है ? तो इस पर कहते हैं।
आत्मा में परब्रह्म से अतिरिक्त स्वर्ण में अँगूठी आदि के समान प्रातीतिक भी अहंपद वाच्य ज्ञानी
के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि अद्वितीय आत्मा में अज्ञ आदमी के समान विशिष्टता भ्रान्ति से भी नहीं है,
जिसमें विशेषण का अपलाप किया जाय