Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
शिलोदराकारघनं प्रशान्तं महाचिते रूपमिदं स्वमच्छम् ।
नैवास्ति नास्तीति दृशौ क्वचित्तु यच्चास्ति तत्साधु तदेव भाति ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्फटिक शिला के मध्य भाग के समान
शून्याकार प्रतीत होता हुआ भी घन, शान्त, निर्मल महाचिति का यह रूप उसमें प्रतिबिम्बित वन,
नगर, नदी आदि के स्वरूप के समान है नहीं है, इस दृष्टि में तो कहीं नहीं है और जो प्रतिभानमात्र से
है, वह चिद्रूप ही स्पष्टरूप से वैसा भासित होता हे