Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथा दामादयो राम स्थिता मायामया इति ।
असत्या एव सत्याभा मृगतृष्णाम्बुपूरवत् ॥ १५ ॥
तथैवेमे वयमपि ससुरासुरदानवाः ।
असत्या एव वल्गामो याम आयाम एव च ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि व्यावहारिक प्रमाणों के व्यवहारयोग्य होने के कारण हम लोगो के शरीरों की आप सत्ता मानते
हैं, तो दाम आदि की भी वह सत्ता समान ही है। यदि तत्त्वज्ञान से बाध्य होने के कारण या दुर्निरूपणीय
होने के कारण असत्ता कहते हैं, तो वह भी उनकी हमारे तुल्य ही है, इसलिए मेरे कथन में कुछ विरोध
नहीं है, इस आशय से वसिष्ठजी उत्तर कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे दाम आदि मृगतृष्णा के जल के प्रवाह के सदृश
मायामय होने से असत्य होते हुए भी सत्य के सदृश स्थित हैं वैसे ही देवता, असुर तथा दानवों के सहित
ये हम लोग भी असत्य होते हुए ही बोलते हैं, जाते हैं और आते हैं