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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

ब्रह्म सर्वं जगदिति वक्तुं नाज्ञस्य युज्यते । तपोविद्याननुभवे स तदेवानुभूतवान् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

तमेत वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसा नाशकेन “इस श्रुति से ज्ञान में अधिकार की सिद्धि के लिए तप आदि का विधान है, इसलिए भी तप, उपासना आदि से असंस्कृत अज्ञ उपदेश के योग्य नहीं, ऐसा कहते है । सम्पूर्ण जगत ब्रह्म है ऐसा उपदेश देने के लिए अज्ञ योग्य नहीं हे, क्योकि तप, विद्या आदि का अनुभव न होने पर यानी अनुभव प्रयुक्त संस्कार न होने पर इस अज्ञ ने संसारी देहात्मभाव का ही अनादिकाल से अनुभव किया है, कभी भी असंसारी आत्मभाव का अनुभव नहीं किया