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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 21

बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवाँ सर्ग विशुद्ध पुरुष मेँ कल्पक का अभाव होने से मन की कल्पना नहीं होती और अविशुद्ध में मन की सिद्धि होने से अनेक मत-मतान्तरों की कल्पनाएँ होती हैं, यह कथन ।

51 verse-groups

  1. Verses 1–3जो वस्तु तुच्छ नहीं है, आयासरहित है, उपाधिशून्य है और भ्रमरहित है उसका यत्न से अनुसन्धान…
  2. Verse 4इस तरह श्रीरामचन्द्रजी के पूछने पर श्रीवस्रिष्ठजी तत्त्वपदार्थ के परिचय से चमत्कारयुक्त श…
  3. Verse 5आपकी बुद्धि पूर्वापर विचार में तत्पर है, इसलिए शंकर आदि देवताओं ने जो पद प्राप्त किया है,…
  4. Verses 6–7शुद्ध चिदात्मा में अविद्या का कलंक युक्त नहीं है, यह प्रश्न जो पुरुष शुद्धात्मा का अनुभव…
  5. Verse 8हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे वर्षा ऋतु में मयूर की वाणी सुशोभित होती है, शरत काल में हंस की व…
  6. Verse 9इस समय यह आपका प्रश्न वर्षा ऋतु में आकाश की स्वाभाविक नीलिमा के वर्णन के तुल्य है, ऐसा कह…
  7. Verse 10इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान कर प्रस्तुत विषय के श्रवण में श्रीरामचन्द्…
  8. Verse 11पूर्वोक्त रीति से चैतन्य में मलिनता अज्ञानियों के अनुभव से सिद्ध है । उस मालिन्य से उपहित…
  9. Verse 12बहुत से वादी अपने-अपने अभिमत नाम-रूप और आकार से उसी की अन्य-अन्यरूप से कल्पना करते हैं, इ…
  10. Verse 13यदि एक ही मूल है, तो वादियों के सिद्धान्तभेद कैसे हुऐ ? इस शंका के समाधान के बहाने वही कर…
  11. Verses 14–15इसलिए अपनी-अपनी वासना से कल्पित का ही युक्ति से निर्णय कर उसी का पुनः पुनः विकल्प करते हु…
  12. Verse 16जैसे सुगन्धित पदार्थ के भीतर स्थित वायु सुगन्धिता को प्राप्त होता है, वैसे ही मन जिस प्रक…
  13. Verse 17ज्ञानेन्द्रियों के आविर्भूत होकर अपने-अपने विषय में प्रवृत्त होने पर उनसे कर्मेन्द्रियसमू…
  14. Verse 18क्षुब्ध हुए कर्मेन्द्रिय के अपनी क्रियाशक्ति को प्रकट करने पर वायु मे धूलि समूह की तरह प्…
  15. Verse 19मन की कर्मरूपता प्राप्ति का उपसंहार करते हुए कर्म ओर मन की परस्पर बीजरूपता और अभिन्नसत्ता…
  16. Verses 20–21इस प्रकार वासना, कर्म ओर उसके फलरूप अनुभवों की भी समान रूप होने से एक ही सत्ता है, ऐसा कह…
  17. Verse 22मन जिस जिस भाव को प्राप्त होता है, उसी उसी को वस्तुरूप से प्राप्त होता है, वही श्रेय है,…
  18. Verse 23अपनी ही प्रतीति से अत्यन्त अनुविद्ध हुए मन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिऐ सदा ही प्रयत्न…
  19. Verse 24उन वादियों में कपिलजी के अनुयायियों का मन विवेकी होने से असंग, चिन्मात्र त्वंपदार्थविषयक…
  20. Verse 25हमने जो उपाय कहा है, उसके बिना किसी को भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती है, इस प्रकार के…
  21. Verse 26ऐसे ही वेदान्तवादी भी हैं, ऐसा कहते हैं। श्रुतिरूप प्रमाण से अध्यारोप ओर अपवाद द्वारा यह…
  22. Verse 27हमारे उपाय के बिना किसी को भी मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती, इस प्रकार के निश्चय से युक्त च…
  23. Verse 28विज्ञानवादियों ने अपनी अत्यन्त भ्रम के प्रवाह से पूर्ण बुद्धि से सांवर्तिक उपद्रव के उपशम…
  24. Verse 29हममें परिकल्पित उपाय के बिना किसी को भी मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती, इस प्रकार के निश…
  25. Verse 30आर्हत (अरिहंत) आदि अन्यान्य लोगों ने भी अपनी अभिमत इच्छा से (५) जीव, अजीव, आस्रव, संवर, न…
  26. Verse 31बिना किसी निमित्त के उठे हुए निर्मल जल के बुद्बुदों के समूहों की तरह उदित हुए अपने निश्चय…
  27. Verse 32हे महाबाहो, इन सभी रीतियों का एक मात्र मन ही आगार है, जैसे कि मणियों का सागर आगार है
  28. Verse 33नीम ओर ईख ये दोनों कड्वे या मीठे नहीं है । चन्द्रमा ओर अग्नि शीत ओर गर्म नहीं ह । जिसका ज…
  29. Verse 34यदि इस प्रकार के तुच्छ फल में भी दृढ़ अभ्यास की अपेक्षा है, तो अनादि सांसारिक विपरीत भावन…
  30. Verses 35–36मुक्ति के लिए किस वस्तु का दृढ़ अभ्यास करना चाहिये, ऐसी कोड यदि शंका करे, तो उस पर दश्यमा…
  31. Verse 37हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, अपवित्र, असद्रूप, मोह में डालनेवाले, भय के कारण, प्रतीतिमात्र…
  32. Verse 38मन को एक मात्र दृश्य में तत्पर देखकर आप दृश्य को मोह में डालनेवाला जानिये, उस अत्यन्त मलि…
  33. Verse 39यदि कोई शंका करे कि दृश्य ने क्या बिगाडा है, जिसके परिमार्जन के लिए आप कहते है, तो इस पर…
  34. Verse 40जैसे पटल नामक रोग से अन्ध बना हुआ पुरुष सूर्य के दैदीप्य आलोक को नहीं देखता, वैसे ही इस अ…
  35. Verses 41–43आकाश में वृक्ष की तरह संकल्प से वह अविद्या स्वयं उत्पन्न होती है । हे महामते, भावना के अस…
  36. Verse 44सत्यदृष्टि के प्राप्त होने पर असत्य जगत के क्षीण होने पर निर्मलस्वरूप निर्विकल्प चिद्रूप…
  37. Verse 45न तो अकल्याणकारिणी भावना से और न चित्त, इन्द्रियदृष्टियों से जिसकी उपलब्धि होती है, जैसे…
  38. Verse 46जैसे यह रस्सी है या नहीं, इस प्रकार रस्सी में सन्देह होने पर सर्पत्वभ्रम होता है वैसे ही…
  39. Verse 47जैसे एक ही आकाश रात और दिन में अन्यस्वरूपता को प्राप्त होता है। वैसे ही कल्पितवस्तु में स…
  40. Verse 48जो तुच्छ नहीं है, क्लेशशून्य है, उपाधिरहित है, भ्रम से शून्य है और तत्‌- तत्‌ कल्पनाओं से…
  41. Verses 49–51जैसे कोठिले के सिंह आदि से रहित रहने पर भी इसमें सिंह है, ऐसा भय होता है, वैसे ही शून्य श…
  42. Verse 52जीव की कल्पना के कारण धन-वैभव और दारिद्यरूप शुभ और अशुभ भाव एक क्षण में तिरोभाव को प्राप्…
  43. Verses 53–54माता ही यदि गृहिणी के भाव से गृहीत होकर गले लगती है, तो सुरतानन्द देनेवाली गृहिणी का कार्…
  44. Verse 55समस्त पदार्थ जातों को भावानुरूपी फल देनेवाले जानकर इस संसार में ज्ञानी पुरुष पदार्थों में…
  45. Verse 56दृढभावना से चित्त जिस पदार्थ की जैसी खूब भावना करता है, उस समय तदाकार तत्‌-तत्‌ फल को देख…
  46. Verses 57–59वह वस्तु नहीं है, जो सत्य न हो, ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो मिथ्या न हो । जिसका जिसने जिस प…
  47. Verse 60यदि कहिये, मैंने संकल्पो के साथ यद्यपि द्वैतभाव का त्याग कर दिया है तथापि जैसे शुद्ध मणि…
  48. Verse 61चित्त का निरोध करने पर भी यदि दैव योग से द्वैत का प्रतिबिम्ब हो भी जाय, तो उसे मिथ्या समझ…
  49. Verse 62अथवा उसका चिदात्मा के साथ एकता के अनुसन्धान द्वारा प्रविलापन करना चाहिये, ऐसा कहते हैं ।…
  50. Verse 63हे श्रीरामचन्द्रजी, आपके चित्त में जिन भावों का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वे स्फटिक की भाँति आ…
  51. Verse 64अथवा द्वैत की प्रतीति हो, तथापि निर्विकार आत्मा का बोध होने के कारण स्फटिक के समान स्वच्छ…